दिगंबर परंपरा में कुंदकुंद का स्थान महावीर और गौतम के ठीक बाद है। दिगंबर मंगलपाठ में उनका सीधा नाम आता है: “मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणी, मंगलं कुंदकुंदार्यो, जैन धर्मोऽस्तु मंगलम्।” मुनि परंपराएँ स्वयं को कुंदकुंद अन्वय — उनकी परंपरा — कहती हैं।
उनकी प्राकृत रचनाएँ — समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकायसार, नियमसार और अष्टपाहुड — जैन धर्म के सर्वाधिक अध्ययन किए जाने वाले ग्रंथों में हैं। विशेष रूप से समयसार आत्मा का दो दृष्टियों से वर्णन करता है: व्यवहार अर्थात् लौकिक दृष्टि, जिसमें आत्मा कर्म करती है और कर्मों से बँधती है, और निश्चय अर्थात् परमार्थ दृष्टि, जिसमें आत्मा शुद्ध ज्ञायक है, अपने से बाहर की किसी वस्तु से अछूती। पीढ़ियों से साधकों ने इसमें अंतर्जागृति का मार्ग पाया है।
एक दिगंबर परंपरा मानती है कि वे आध्यात्मिक देह से विदेह क्षेत्र गए, जहाँ कहा जाता है कि तीर्थंकर सीमंधर स्वामी वर्तमान में उपदेश दे रहे हैं, और वहाँ से वह उपदेश लेकर लौटे। उनका नाम आज के आंध्र प्रदेश में, कर्नाटक की सीमा के निकट स्थित कोंडकुंदे (कोनकोंडला) से जुड़ा है।

