जैन धर्म
अहिंसा और आत्म-विजय का प्राचीन मार्ग
जैन धर्म विश्व के सबसे प्राचीन जीवित धर्मों में से एक है। इसका लक्ष्य है — राग और द्वेष पर विजय द्वारा, अपने ही पुरुषार्थ से, प्रत्येक आत्मा की मुक्ति — किसी सृष्टिकर्ता ईश्वर पर निर्भर हुए बिना।
शब्द
“जैन” का अर्थ क्या है?
जिन वह है जिसने क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे आंतरिक शत्रुओं पर विजय पा ली है। जिनों का अनुयायी जैन कहलाता है। जिनवाणी का अर्थ है जिनेंद्र भगवान की वाणी या उपदेश।
जो जिन दूसरों के लिए मार्ग पुनः स्थापित करते हैं, वे तीर्थंकर कहलाते हैं — संसार-सागर को पार करने का तीर्थ (घाट) बनाने वाले। वर्तमान काल-चक्र में 24 तीर्थंकर हुए हैं।
- जिनजिन
- “विजेता” — जिसने क्रोध, मान, माया और लोभ को जीत लिया।
- तीर्थंकरतीर्थंकर
- “तीर्थ बनाने वाले” — संसार-सागर को पार करने का घाट बनाने वाले।
- जिनवाणीजिनवाणी
- “जिनों की वाणी” — उनका उपदेश, जो हम तक पहुँचा।
इतिहास
भगवान महावीर
24वें तीर्थंकर वर्धमान महावीर का जन्म वर्तमान बिहार में हुआ — दिगंबर परंपरा के अनुसार नालंदा के निकट कुंडलपुर में (कई इतिहासकार उनका जन्मस्थान वैशाली के निकट मानते हैं)। परंपरा के अनुसार उनका काल ई.पू. 599–527 है। 30 वर्ष की आयु में उन्होंने राजसी जीवन त्यागा, बारह वर्ष तप और ध्यान किया, केवलज्ञान प्राप्त किया, और तीस वर्ष उपदेश देने के बाद पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया।
महावीर ने जैन धर्म की स्थापना नहीं की। जैन उन्हें उन 24 उपदेष्टाओं में अंतिम मानते हैं जिन्होंने एक शाश्वत मार्ग को पुनर्जीवित किया; उनसे पहले के तीर्थंकर पार्श्वनाथ को भी इतिहासकार व्यापक रूप से ऐतिहासिक व्यक्ति मानते हैं।
- जन्मकुंडलपुर, बिहार
- दीक्षा30 वर्ष की आयु में
- केवलज्ञान12 वर्ष के तप के बाद
- निर्वाणपावापुरी, 72 वर्ष की आयु में
दर्शन
आत्मा और कर्म
हर जीव — मनुष्य से लेकर पौधे और सूक्ष्म जीव तक — में आत्मा (जीव) है, जिसका सच्चा स्वभाव अनंत ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य है। यह स्वभाव कर्म से ढका है — सूक्ष्म पुद्गल जो कषाय और प्रमादपूर्ण क्रियाओं से आत्मा से बंध जाता है।
जब सभी कर्म झड़ जाते हैं, आत्मा मुक्त (मोक्ष) होकर सिद्ध बन जाती है — शुद्ध, और फिर कभी जन्म नहीं लेती।
तत्त्व
सात तत्त्व
जैन दर्शन बंधन और मुक्ति को सात मूल तत्त्वों द्वारा समझाता है।
1–2 क्या है
जीवचेतन आत्मा।अजीवअचेतन — पुद्गल, आकाश, काल, धर्म (गति का माध्यम) और अधर्म (स्थिति का माध्यम)।3–4 आत्मा कैसे बँधती है
आस्रवआत्मा में कर्मों का आगमन।बंधकर्मों का आत्मा से बंधना।5–6 वह कैसे मुक्त होती है
संवरनए कर्मों के आगमन को रोकना।निर्जरातप द्वारा बंधे हुए कर्मों का झड़ना।7 लक्ष्य
मोक्षसभी कर्मों से पूर्ण मुक्ति।
परंपराएँ
दिगंबर और श्वेतांबर
जैन धर्म की दो प्रमुख परंपराएँ हैं जिनकी मूल शिक्षाएँ समान हैं। दिगंबर (“दिशाएँ ही वस्त्र”) मुनि वस्त्र सहित सभी परिग्रह त्याग देते हैं। श्वेतांबर (“श्वेत वस्त्रधारी”) साधु-साध्वी सादे सफ़ेद वस्त्र पहनते हैं। दोनों में कुछ शास्त्रों, स्त्री-मुक्ति के प्रश्न, और पूजा-विधि व प्रतिमा-विवरण को लेकर अंतर है।
जिनवाणी वह प्रस्तुत करती है जो दोनों परंपराओं में समान है, और जहाँ अंतर है वहाँ स्पष्ट उल्लेख करती है।
दिगंबर · “दिशाएँ ही वस्त्र”
- मुनि वस्त्र सहित सब कुछ त्याग देते हैं; केवल पिच्छी और कमंडल रखते हैं।
- तीर्थंकर प्रतिमाएँ वस्त्र और आभूषण रहित, ध्यानमग्न नेत्रों वाली होती हैं।
- आगम: षट्खंडागम तथा कुंदकुंद और उमास्वामी की रचनाएँ।
श्वेतांबर · “श्वेत वस्त्रधारी”
- साधु और साध्वियाँ सादे श्वेत वस्त्र पहनते हैं और कुछ आवश्यक वस्तुएँ रखते हैं।
- मंदिर की प्रतिमाएँ प्रायः अधोवस्त्र, जड़ी हुई आँखों और आभूषणों के साथ होती हैं।
- आगम: वलभी वाचना में निश्चित लगभग पैंतालीस आगम ग्रंथ।
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शिक्षाएँआगे पढ़ें — जैन शिक्षा का सारआगे पढ़ें →जैन वर्ष
जैन पर्व
जैन पर्व सांसारिक घटनाओं का नहीं, आत्मा की यात्रा का उत्सव हैं — अधिकांश उपवास, प्रार्थना, क्षमा और दान से मनाए जाते हैं। ये चंद्र पंचांग पर आधारित हैं, इसलिए तिथियाँ हर वर्ष बदलती हैं।
हर वर्ष की सटीक तिथियाँ जिनवाणी कैलेंडर में जोड़ी जाएँगी। तब तक कृपया अपने स्थानीय मंदिर या पंचांग से पुष्टि करें।
- मार्च – अप्रैलचैत्र शुक्ल त्रयोदशी
महावीर जन्म कल्याणक
भगवान महावीर का जन्म (महावीर जयंती) — शोभायात्रा, जिन-प्रतिमा के अभिषेक और दान के साथ मनाया जाता है।
- अप्रैल – मईवैशाख शुक्ल तृतीया
अक्षय तृतीया
ऋषभनाथ द्वारा श्रेयांस कुमार के दिए इक्षु-रस से लंबे उपवास के पारणे की स्मृति। वर्षीतप करने वाले इसी दिन पारणा करते हैं।
- अगस्त – सितंबरभाद्रपद
पर्युषण और दसलक्षण पर्व
सबसे महत्त्वपूर्ण जैन पर्व। श्वेतांबर आठ दिन पर्युषण मनाते हैं, जिसका समापन संवत्सरी पर होता है। दिगंबर दस दिन दसलक्षण पर्व मनाते हैं, जिसका हर दिन एक धर्म को समर्पित है: क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य।
- अगस्त – सितंबरपर्युषण / दसलक्षण के अंत में
संवत्सरी और क्षमावाणी
क्षमा का दिन। जैन सभी से — और सभी जीवों से — “मिच्छामि दुक्कडम्” कहकर क्षमा माँगते हैं: मेरे सभी दुष्कृत्य मिथ्या (निष्फल) हों।
- अक्टूबर – नवंबरकार्तिक अमावस्या
दीपावली — महावीर निर्वाण
पावापुरी में महावीर के निर्वाण का दिन; दीपक उस ज्ञान-प्रकाश के प्रतीक हैं जो वे छोड़ गए। उसी रात उनके प्रमुख गणधर गौतम स्वामी को केवलज्ञान हुआ, और अगले दिन से जैन नववर्ष (वीर निर्वाण संवत्) आरंभ होता है।
- अक्टूबर – नवंबरकार्तिक शुक्ल पंचमी
ज्ञान पंचमी
ज्ञान की आराधना का दिन — शास्त्रों की सफ़ाई, प्रदर्शन और पूजा की जाती है। दिगंबर ज्येष्ठ (मई – जून) में श्रुत पंचमी मनाते हैं।
लगभग बारह वर्षों में एक बार
महामस्तकाभिषेक
श्रवणबेलगोला, कर्नाटक
बाहुबली प्रतिमा का भव्य अभिषेक — ऊपर से जल, दूध, इक्षु-रस, केसर और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। विश्व के सबसे बड़े जैन समागमों में से एक।

