आचार्य · शास्त्रीय युग के महान आचार्य

आचार्य हीरविजय सूरि

जगद्गुरु · हीरसूरि

1527–1596 · पालनपुर (गुजरात) → फतेहपुर सीकरी → ऊना

श्वेतांबर

तपागच्छ के आचार्य, जिन्होंने सम्राट अकबर को अहिंसा की प्रेरणा दी

मुगल दरबार में आमंत्रित हीरविजय सूरि ने सम्राट अकबर को जैन पर्वों पर पशुओं की रक्षा करने और जैन तीर्थयात्रियों पर लगे कर हटाने के लिए प्रेरित किया।

कथा

हीरविजय का जन्म गुजरात के पालनपुर में एक ओसवाल जैन परिवार में हुआ, और बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया। लगभग तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने विजयदान सूरि से दीक्षा ली, गहन अध्ययन किया और 1553 में आचार्य पद पाया; आगे चलकर उन्होंने तपागच्छ का नेतृत्व किया, जो उस समय सबसे बड़े श्वेतांबर संघों में था। उनकी विद्वत्ता और संयम की ख्याति सुनकर सम्राट अकबर ने उन्हें आमंत्रित किया, और 1582 में वे जैन मुनियों की रीति के अनुसार पैदल विहार करते हुए फतेहपुर सीकरी पहुँचे।

अकबर और उनके मंत्री अबुल फ़ज़ल से चर्चाओं में हीरविजय ने अहिंसा और करुणा की बात रखी। अकबर ने फ़रमान (शाही आदेश) जारी कर पर्युषण के दिनों में पशु-वध पर रोक लगाई और शत्रुंजय जैसे जैन तीर्थों के यात्रियों पर लगा कर हटाया, और हीरविजय को जगद्गुरु, अर्थात् 'विश्व के गुरु', की उपाधि से सम्मानित किया। उनके शिष्य शांतिचंद्र और भानुचंद्र दरबार में रहे। हीरविजय ने सौराष्ट्र के ऊना में देह त्यागी।

किसके लिए स्मरणीय

  • तपागच्छ के नायक
  • अहिंसा के लिए अकबर के फ़रमान
  • 'जगद्गुरु' उपाधि
काल
1527–1596 ई. (कुछ स्रोतों में 1526–1595)
स्थान
पालनपुर (गुजरात) → फतेहपुर सीकरी → ऊना

स्रोत: हीरसौभाग्य काव्य; अबुल फ़ज़ल, आईन-ए-अकबरी; विकिपीडिया; एनसाइक्लोपीडिया.कॉम; जैनसाइट