आचार्य · आधुनिक युग

आचार्य विजय वल्लभ सूरि

पंजाब केसरी

1870–1954 · वडोदरा, गुजरात; कार्यक्षेत्र पंजाब; मुंबई में देहावसान

श्वेतांबर
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Acharya Vijay Vallabh Suri

जैन विद्यालयों, महाविद्यालयों और छात्रावासों के प्रेरक आचार्य

विजयानंद सूरि के शिष्य, जो मानते थे कि शिक्षा ही सशक्त समाज की कुंजी है, और जिनकी प्रेरणा से पश्चिमी व उत्तरी भारत में अनेक विद्यालय और महाविद्यालय बने।

शिष्य — आचार्य विजयानंद सूरि

कथा

1870 में वडोदरा में जन्मे बालक का नाम छगन था; माता-पिता का साया बचपन में ही उठ गया। विजयानंद सूरि का प्रवचन सुनकर वे उनके साथ चल पड़े और 1887 में राधनपुर में मुनि वल्लभविजय के रूप में दीक्षा ली। गुरु ने उन्हें पंजाब के जैनों की देखभाल का दायित्व सौंपा और उन्होंने जीवन भर उसे निभाया। 1924 में लाहौर में उन्हें आचार्य पद मिला और पंजाब संघ ने उन्हें पंजाब केसरी कहकर सम्मानित किया।

वे सिखाते थे कि विद्यालयों के बिना कोई समाज टिक नहीं सकता। उनकी प्रेरणा से 1915 में मुंबई में महावीर जैन विद्यालय की स्थापना हुई और फिर पंजाब, राजस्थान और गुजरात में विद्यालय, महाविद्यालय व छात्रावास बने। 1947 के विभाजन में उन्होंने गुजरांवाला से विमान द्वारा निकलना अस्वीकार किया और जैन समाज के साथ पैदल भारत आए। 1954 में मुंबई में उनका देहावसान हुआ। दिल्ली का वल्लभ स्मारक उनकी स्मृति में है और 2009 में भारत सरकार ने उन पर डाक टिकट जारी किया।

किसके लिए स्मरणीय

  • महावीर जैन विद्यालय
  • आत्मानंद जैन विद्यालय व महाविद्यालय
  • पार्श्वनाथ उम्मेद महाविद्यालय, फालना
काल
जन्म 26 अक्टूबर 1870; देहावसान 22 सितंबर 1954
स्थान
वडोदरा, गुजरात; कार्यक्षेत्र पंजाब; मुंबई में देहावसान

स्रोत: विकिपीडिया (वल्लभ सूरि); भारतीय डाक टिकट विवरणिका; vijay-vallabh.in