मूडबिद्री — कन्नड़ में 'पूर्व का बाँस' — चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच चौटा शासकों और अपने मठ के भट्टारकों के संरक्षण में तटीय कर्नाटक का सबसे बड़ा जैन नगर बना। अठारह बसदियाँ एक-दूसरे से थोड़ी ही दूरी पर खड़ी हैं, इसीलिए नगर को दक्षिण की जैन काशी कहा जाता है। सबसे पुरानी गुरु बसदि परंपरा से 714 ईस्वी की मानी जाती है और उसमें काले पत्थर की ऊँची पार्श्वनाथ प्रतिमा है।
सावीर कंबद बसदि — हज़ार स्तंभों का मंदिर — 1430 ईस्वी में स्थानीय शासक देवराय वोडेयर के समय आरंभ हुआ और लगभग तीस वर्षों में पूरा हुआ। इसके ग्रेनाइट स्तंभ सब अलग-अलग हैं, और तटीय वर्षा से बचाने वाली, ताँबे से मढ़ी, चौड़े छज्जों वाली लकड़ी की बहुमंज़िली छतें इसे जैन स्थापत्य में अनोखा रूप देती हैं। भीतर आठ फुट ऊँची चंद्रनाथ — आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभ — की प्रतिमा है। सामने कारकल की रानी नागल देवी द्वारा खड़ा किया गया 50 फुट ऊँचा मानस्तंभ है।
मूडबिद्री की सबसे बड़ी निधि पत्थर नहीं है। धवला, जयधवला और महाधवला की ताड़पत्र प्रतियाँ — सबसे प्राचीन उपलब्ध दिगंबर आगम षट्खंडागम की विशाल टीकाएँ — सुरक्षा के लिए यहाँ लाई गईं और गुरु बसदि के भीतर सिद्धांत बसदि में रखी गईं। उन्नीसवीं शताब्दी में विद्वानों ने उन्हें फिर पहचाना; 1939 से आरंभ हुए उनके प्रकाशन ने दिगंबर आगम की प्राचीनतम परत को आधुनिक अध्ययन के लिए खोल दिया। ये ग्रंथ कब और कहाँ से मूडबिद्री लाए गए, इस पर विवरण भिन्न हैं।

