उनका नाम शरीर के पार्श्वों (बगलों) से जुड़ा है, जिसकी व्याख्या यह है कि गर्भकाल में रानी का शरीर स्वस्थ और कष्ट-रहित हो गया था।
उनका लांछन, स्वस्तिक, जैन धर्म के अष्ट मंगल चिह्नों में से एक है। इसकी चार भुजाएँ अस्तित्व की चार गतियों — देव, मनुष्य, तिर्यंच और नरक — की प्रतीक हैं, जिनसे आत्मा मुक्ति चाहती है।

