1914 में राजस्थान के बूंदी जिले के गंभीरा गाँव में जन्मे चिरंजीलाल बचपन में ही अनाथ हो गए और उनकी बड़ी बहन ने उन्हें पाला तथा मंदिर-दर्शन की ओर प्रेरित किया। जीव-हिंसा के कारण उन्होंने कपड़ा मिल की नौकरी छोड़ी और विवाह से इनकार किया। 1944 में उन्होंने आचार्य चंद्रसागर से क्षुल्लक दीक्षा ली और 1951 में फुलेरा (राजस्थान) में आचार्य वीरसागर से मुनि धर्मसागर के रूप में मुनि दीक्षा पाई; इस प्रकार वे शिवसागर जी के गुरुभाई बने।
फ़रवरी 1969 में आचार्य शिवसागर जी की अचानक समाधि होने पर श्री महावीरजी में संघ ने धर्मसागर जी को अगला आचार्य चुना — वे शांतिसागर परंपरा के तृतीय पट्टधर बने। सरलता और आगम के प्रति दृढ़ निष्ठा के लिए प्रसिद्ध, वे 1974 में भगवान महावीर के 2500वें निर्वाण महोत्सव के लिए संघ सहित दिल्ली गए और अनेक मुनियों व आर्यिकाओं को दीक्षा दी। उन्होंने अपने सम्मान में अभिनंदन ग्रंथ तक स्वीकार नहीं किया। 1987 में राजस्थान के सीकर में उनकी समाधि हुई; उनकी परंपरा आगे के पट्टधरों से चल रही है।

