तीर्थंकर · क्रम 14/24

अनंतनाथ

“अनंत” — आत्मा के चार अनंत गुणों (अनंत चतुष्टय) का जीवंत स्मरण।

सेहीश्वेतांबर: बाज़ (श्येन)
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Anantanatha, Tirthankara 14
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कथा

उनका नाम माता के स्वप्न में देखी गई रत्नों की अनंत माला से पड़ा — अनंत, जिसका अंत न हो।

इस नाम में सैद्धांतिक गहराई है। जैन धर्म में मुक्त आत्मा चार अनंतों से परिभाषित होती है — अनंत ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य (अनंत-चतुष्टय)। अनंत नाम के तीर्थंकर उस लक्ष्य का सजीव कथन हैं।

उनका लांछन भी वह बिंदु है जहाँ परंपराएँ भिन्न हैं, और यह भेद दिखाई देता है: श्वेतांबर प्रतिमाओं में बाज़, दिगंबर प्रतिमाओं में सेही। किसी जैन प्रतिमा की पहचान करते समय परंपरा के अनुसार लांछन की जाँच करना पहला कदम है।

स्रोतसमवायांग; त्रिषष्टि पर्व 4; उत्तरपुराण।