उनका नाम माता के स्वप्न में देखी गई रत्नों की अनंत माला से पड़ा — अनंत, जिसका अंत न हो।
इस नाम में सैद्धांतिक गहराई है। जैन धर्म में मुक्त आत्मा चार अनंतों से परिभाषित होती है — अनंत ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य (अनंत-चतुष्टय)। अनंत नाम के तीर्थंकर उस लक्ष्य का सजीव कथन हैं।
उनका लांछन भी वह बिंदु है जहाँ परंपराएँ भिन्न हैं, और यह भेद दिखाई देता है: श्वेतांबर प्रतिमाओं में बाज़, दिगंबर प्रतिमाओं में सेही। किसी जैन प्रतिमा की पहचान करते समय परंपरा के अनुसार लांछन की जाँच करना पहला कदम है।

