उनका जन्म 13 मई 1962 को राजस्थान के सरदारशहर में झूमरमल और नेमादेवी दूगड़ के घर हुआ और नाम मोहन दूगड़ रखा गया। 5 मई 1974 को, बारह वर्ष की आयु में, उन्होंने वहीं आचार्य तुलसी के नेतृत्व वाले तेरापंथ संघ में मुनि सुमेरमल से दीक्षा ली। उन्होंने तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ के निकट रहकर अध्ययन और सेवा की। सितंबर 1997 में वे युवाचार्य अर्थात् मनोनीत उत्तराधिकारी बने, और महाप्रज्ञ के देहावसान के बाद 23 मई 2010 को तेरापंथ के ग्यारहवें आचार्य बने।
2014 में वे दिल्ली के लाल किले से तीन संदेशों — सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति — के साथ अहिंसा यात्रा पर निकले। साधु-साध्वियों के साथ भारत के 23 राज्यों और नेपाल व भूटान से होकर यह यात्रा 50,000 किमी से अधिक चली और मार्च 2022 में दिल्ली में संपन्न हुई। वे आज भी तेरापंथ धर्मसंघ का नेतृत्व करते हुए पैदल विहार करते हैं और अणुव्रत तथा प्रेक्षा ध्यान की शिक्षा देते हैं। उनकी पुस्तक विजयी बनो 2013 में लोकार्पित हुई।

