छठे चक्रवर्ती सम्राट और सत्रहवें तीर्थंकर। उनका नाम ही सबसे उल्लेखनीय है। जैन प्रयोग में कुंथु एक अत्यंत सूक्ष्म कीट है — शास्त्रों में वर्णित सबसे छोटे देहधारी जीवों में से एक, जिसका नाम मुनि-आचार के नियमों में उस जीव के रूप में आता है जिसे बैठते, चलते या पात्र रखते समय मुनि को कुचलने से बचाना चाहिए।
शास्त्रों के सबसे छोटे जीव के नाम पर एक तीर्थंकर का नाम होना — यह प्रत्येक आत्मा की समान गरिमा के सिद्धांत को एक ही शब्द में समेट देता है: जो जीव दिखाई भी नहीं देता और जो संसार का सम्राट है, दोनों के लिए एक ही नाम। मुखवस्त्रिका, कोमल पिच्छी, छना हुआ जल और रात्रि-भोजन का त्याग — ये सब यहीं से अर्थ पाते हैं।

